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 साहित्य दर्शन
 

फरवरी 16
 
मनुष्य की प्रक्रति और समाज

प्रकृति ने मनुष्य की रचना अपनी योजना के अनुसार ही की है । इस योजना की जानकारी के लिए मनुष्य को अपने आपको तो पहचानना ही होगा साथ ही प्रकृति को भी पहचानना होगा । यह जानना उसी तरह से होना चाहिए जिस तरह से किसी नई मशीन की कार्यप्रणाली को जानने के लिए हम जब तक उसको बनाने वाले इंजिनियर की ड्राइंग का अघ्ययन न कर लें तब तक हम उस मशीन को चला नहीं सकते । इंजिनियर की बुद्धि के अतिरिक्त कोई भी नहीं है जो मशीन के उद्देष्य को स्पष्ट कर सके । हमारा मामला भी ठीक ऐसा ही लगता है ।
मनुष्य के अस्तित्व का पूरे ब्रम्हाण्ड में कोई दूसरा उदाहरण पाया ही नहीं जा सकता । प्रकृति ने मनुष्य की रचना किसी विश

 
प्रधान सम्पादक
मोनिका मंथन
monika.manthan@gmail.com
 
सम्पादक
रमेश खत्री
(Mob)-09414373188
RAMESH_AIR2007@rediffmail.com
kramesh_air123@yahoo.com
 
तकनिकी सहायक
हरेन्द्र सिह चौधरी
(Mob)-09461587155
hsc.soft@gmail.com
 
भारत शेखर वशिष्ठ
ेष योजना के अनुरूप ही की है । शायद वह चाहती है कि वर्तमान अपूर्ण मनुष्य जीवन भर परीक्षा का अंतराल व्यतीत करे । और कालांतर में अपने कार्यव्यवहार के बल पर एक पूर्ण और अनंत संसार में सदैव जीने का अधिकार प्राप्त करे । इसी का दूसरा नाम समाज है ।
जो भी इस परीक्षा में अपनी योग्यता सिद्ध करेंगे उन्हें अपना बनाया हुआ सुसंस्कृत समाज मिलेगा । इस सब में मनुष्य की भावनाएं, क्रोध, प्रतिषोध, ईर्ष्या, घृणा, प्रतिद्वंद्विता रूपी नकारात्मक दीवारें उसकी राह की बाघा के रूप में आती है । ये मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित तो करती ही है बल्कि उसके आस पास के समाज का भी निर्माण करते हैं । बस आवश्यकता यह है कि हमें इन मामलों में सतर्क और अनुशासित होना चाहिए । तभी हम एक अच्छे मानव की परिकल्पना कर सकते हैं और एक अच्छा संसार रच सकते हैं ।
बहरहाल हम फिर हाजि़र है पत्रिका के नये अंक के साथ । हमारे साथ अपनी रचनाओं के साथ इस पत्रिका में मौजूद हैं-डा. हेमलता महेश्वर का आलेख इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां और हिन्दी, विवेक निझावन की कहानी- उसकी मौत, कृष्णदत्त पालीवाल का आलोचनात्मक आलेख- आलोचक अज्ञेय की उपस्थिति, डायरी के पृष्ठ- अमृतलाल नागर, शरद जोशी का व्यंग्य- रेलयात्रा और बदरीनाराण की कविताएं ।
आशा है आपको पत्रिका का यह अंक पंसद आयेगा । आप हमारे साथ अपनी रचनाओं के साथ भी जुड़ेगें । मिलते हैं जल्दी ही पत्रिका के अगले अंक के साथ ।

रमेश खत्री
रमेश खत्री
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